शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

जाना तो नहीं चाहता लेकिन फिर भी चला जा रहा हूँ...

आधी रात के घने कोहरे और ठिठुरन भरे माहौल में  भागती ट्रेन की सीटी और इसके पहियों की आवाज़ सन्नाटे को चीरते हुए पटरी के आस-पास बने घरों से टकरा रही थी.इस वक़्त ट्रेन की आवाज़ सुनकर लग रहा था मानो,  कड़कड़ाती ठण्ड ने उसके दांत जमाँ दिए हों और वो गर्माहट पाने के लिए गुहार लगा रही हो. अभी थोड़ी देर पहले ही मैं पटरी के पास वाले घर पहुंचा था और इस ख्याल में डूबा था कि व्यर्थ अहंकार, अभिमान और नासमझी के बादलों से होने वाली हलकी-फुल्की बूंदा-बंदी जब तेज़ बारिश की शक्ल अख्तियार करती है तो प्यार और अपनेपन की ज़मीन में पनपने वाले रिश्ते उसमें या तो डूब जाते हैं या फिर बह जाते हैं. दोनों ही स्थिति में नुकसान रिश्तों का होता है और हर नुकसान की भरपाई हो ये मुमकिन भी नहीं है.

स्तब्ध और आंसुविहीन, इससे लाचार हालत और क्या हो सकती है? कुछ छः महीने ही हुए थे उससे  मिले हुए और मिलते वक़्त आप कभी बिछड़ने के बारे में नहीं सोचते. वैसे आजतक ये निश्चित नहीं हो पाया कि हमारे रिश्ते की पहल किसने की? मैंने या उसने? लेकिन ये ज़रूर है कि अलग होने का निर्णय मेरा था. दिन, हफ्ते, महीने छोटी-छोटी नोक-झोंक तो होती थीं लेकिन बात यहाँ तक आ पहुंचेगी सोचा नहीं था. "हम दोनों बहुत अलग हैं" कई बार ये सुन चुका था उससे. लेकिन क्या दुनिया मैं हम ही अलग हैं? "मैं ऐसी ही हूँ" ये भी कई बार सुना था और इसके बाद ये भी सुना कि जब तुम्हे मालूम था कि "मैं ऐसी हूँ तो फिर ज़रूरत क्या थी साथ होने की और तुम्हें ये आज ही दिख रहा है कि मैं ऐसी हूँ पहले नहीं दिखा". खैर, आप इंसान से जीत सकते हैं उसके अहंकार से नहीं. वैसे रिश्तों में सही-गलत, हार-जीत जैसा कुछ नहीं होता, जो होता है वो है समझ. मैं उसे समझ तो गया था लेकिन इस उम्मीद के साथ कि शायद उसमें कोई सुधार आएगा. वो खुद में सुधार करने  तैयार नहीं थी. जब आप किसी से मिलते हैं तो मिलते ही साथ उससे ऐसा कुछ नहीं कहते कि उसे कुछ बुरा लगे, वरना आपकी अगली मुलाकात उससे होगी या नहीं, ये पक्का नहीं होता. कुछ लोग खुद से बहुत प्यार करते हैं, खुद की हर चीज़ उन्हें बहुत प्यारी होती है. हिटलर को भी अपनी छोटी सी मूंछ से बड़ा प्यार रहा होगा लेकिन किसी ने उसे ये बताने की हिम्मत नहीं की कि वो मूंछ बहुत अजीब लगती थी, अपनी जान किसे प्यारी नहीं होती? बहुत कम लोग जानते हैं कि हिटलर एक बहुत अच्छा "चित्रकार" भी  था और paint brush  बहुत ख़ूबसूरती से use  करना जानता था. खुद के वजूद को कौन नहीं चाहता? पर ये चाहत, उसे चाहने के आड़े आने लगे तो क्या किया जाये? पहले तो आप उसे नज़रंदाज़ करेंगे, फिर अगर कुछ ज्यादा ही महसूस होने लगे तो सुधारने की कोशिश करेंगे और जब सब तरह से विफल हो जाएँ तो हाथ खड़े कर देंगे. लोगों को कहते सुना है  "मैं आपके दिल में रहना चाहता हूँ", शायद दिल भी एक घर होता है. आप किस घर में जिंदगी भर रहना चाहेंगे ? एक ऐसा घर जिसकी नीवं कमज़ोर हो, जिसके ज़मीने पत्थर हिले हुए हों या फिर एक ऐसा घर जिसकी नीवं को कोई सुनामी, कटरीना, डैज़ी और भूकंप हिला न सके? नीवं मज़बूत की जा सकती है, जब घर बनना शुरू हुआ हो और मैं ये भी सोच रहा हूँ कि एक कोशिश अभी भी की जा सकती है. जबकि सारे प्रयत्न बेकार जा चुके हैं, आखिरी वाला भी. पूरी रात आँखों में कट गयी और सुबह ने खिड़की पर दस्तक दी. मेरे यहाँ से चलने का वक़्त भी हो गया. मैं जा रहा हूँ, मैंने किसी के आवाज़ देने का इंतज़ार भी नहीं किया और किसी ने मुझे आवाज़ भी नहीं दी. जाना तो नहीं चाहता लेकिन फिर भी चला जा रहा हूँ...

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

तुम्हारे नाम

तुम, 

"कभी-कभी आपको वो भी करना पड़ता है, जो आपने सोचा न हो." अपनी बात करूँ तो ऐसा ही लग रहा है अभी कि जो कुछ अब मैं लिखने वाला हूँ, कभी सोचा नहीं था कि इस तरह से भी लिखना पड़ सकता है. जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि अपनी परेशानियाँ यहाँ लिखते वक़्त कुछ हल्का सा लगने लगता है. ये  गलतफहमी भी हो सकती है लेकिन लगता तो कुछ ऐसा ही है. हाड़-मांस के ढाँचे में रहते हुए ये भी लगने लगा है कि अपनी परेशानी को शाब्दिक रूप देकर, शायद उसे आसानी से सुलझाया जा सकता है. अब ये तो आगे ही पता चलेगा कि ये दुबारा उलझने के सुलझेगी या फिर और उलझती जाएगी.
मैंने ऐसा कहीं सुना था कि बातचीत से दो देशों के बीच के झगड़े, मसले और मुद्दे सुलझ जाते हैं. पर मेरा मसला बातचीत से कभी सुलझता ही नहीं है. बातचीत, वो क्या होती है...जब भी होती है सिर्फ बहस ही होती है. लेकिन इतना ज़रूर है कि शुरुआत बातचीत से ही होती है. मसला भी कोई बड़ा मसला नहीं है, लेकिन इस मसले की अहमियत बहुत है. मसला यही है कि " जब भी तुम मुझसे दूर जाते हो, अपने ज़हन से मुझे निकाल कर कहीं बाहर फेंक जाते हो." आज तक तो मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं हमारे रिश्ते को ढो रहा हूँ पर जाने क्यों मुझसे दूर जाने के बाद तुम माथे का पसीना पोछते हुए नज़र आते हो. छोटे शहर के लोगों में attitude नहीं होता, वो Emotional fool होते हैं. बेहद प्यार करने और बेहिसाब नफरत करने की quality सिर्फ छोटे शहर के लोगों में ही होती है और इसी वजह से वो अपने रिश्तों में या तो बहुत सफल होते हैं या फिर बहुत असफल. रिश्तों का ताना-बाना बुनते वक़्त वो ये भूल जाते हैं कि वो "बुनकर" या "जुलाहा" नहीं हैं, जो कहीं भूल-चूक हो जाने पर बिना गठान बांधे दुबारा रिश्तों को बुन सकते हैं. कहीं गठान न बांधनी पड़े इसके लिए भी मैं हमेशा तैयार रहता था, Adjustment  क्या होता है ये उनसे पूछो जो थोड़े से adjustment में अपनी पूरी जिंदगी साथ जीने के लिए तैयार रहते हैं पर उन्हें ये उनके नसीब में Adjustment जैसी कोई चीज़ नहीं होती. अगर कोई कहता है कि Adjustment जैसी कोई भी चीज़ रिश्तों में नहीं होती तो शायद उन्हें ये नहीं मालूम है कि जब भी दुनिया में दो अलग-अलग चीज़ें मिलती हैं तो उनमें Adjustment होता है. भौतिकी के समायोजन का सिद्धांत मानव जीवन के रिश्तों पर भी लागू होता है. पर इसका एक लेवल होता है, ये सिद्धांत इतना भी न लागू होने लगे कि Relation  किसी Technical machine जैसा लगने लगे. कभी गौर किया है तुमने, जब भी हम करीब होते हैं तो Communication का एक तार सा जुड़ा होता है. जो दूर जाते ही टूट जाता है और दूर जाने पर सबसे ज्यादा जिस चीज़ का ज़रूरत होती है वो कम हो जाये तो चलता है लेकिन बिलकुल ख़त्म हो जाये तो तकलीफ होती है. दिन में तुम अपने दोस्तों के साथ हो, शाम को परिवार  के साथ, रात में फ़ोन पर या फिर थक जाने के बाद नींद की आगोश में. फिर मैं कहाँ हूँ? ठीक है एक-दो दिन चलाया जा सकता है. फिर जब भी बात हो तो ऐसी क्यों कि जैसे मैं तुम्हारे लिए अनजान हूँ? प्यार नाम का कुछ तो है हमारे बीच, पर वो तो नदारद हो जाते हैं तुम्हारे जाते ही. एक सच और है जो तुम्हे भी मालूम है कि तुम बहुत ज़िद्दी हो. अब चाहें वो ज़िद सही बात को न मानने की हो या फिर गलत बात मनवाने की. मुझे उम्मीद है कि तुम्हे मेरी बातें समझ आ गयी होंगी.


मैं 

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

ईमेल

सुबह -सुबह एक ईमेल की दस्तक पर, जब इनबॉक्स खोला,
तो देखा, बहुत सारे स्पाम भी आये हैं,
सब्जेक्ट से आकर्षक थे सारे,
जो पहले भी थे आये,
हेडर देखा फुटर देखा,
पूरा मेल पढ़ कर देखा,
तो पता चला,
किसी के बैंक अकाउंट में, बहुत सारा पैसा था,
जिसे हांसिल करने के लिए मेरा सहारा चाहिए,
रकम तो इतनी थी कि जिसे आज तक मैंने सुना न था,
अचानक से याद आया कि,
अखबार में कुछ दिनों पहले,
ऐसे ही किसी ईमेल फ्रौड की खबर आई थी,
फिर भी लगा कि हर बार फ्रौड थोड़े ही होता है,
स्टार का टैग लगा कर अकाउंट साईन आउट कर दिया,
जब भी साईन इन करता,
तो बस उस मेल पर ही नज़र जाती,
दो हफ्ते बीत गए,
सोचा उस मेल का रेप्लाए किया जाये,
लेकिन उस दिन अखबार में फिर एक खबर आ गयी,
"ईमेल के ज़रिये फ्रौड करने वाला गिरफ्तार"
फ्रौड है शायद, फ्रौड ही होगा,
इस तरह इन्टरनेट पर अगर अमीर बनने की तरकीब होती,
तो भिखारी कटोरे की जगह, लैपटॉप लेकर घूमते.

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

मिज़ाज़

पिछले दो दिनों से, जब से मैं शहर लौट कर आया हूँ, बहुत कुछ बदल गया है. मौसम का मिज़ाज़ भी उनमें से एक है और इस बदले हुए मिज़ाज़ की वजह से ही तो मैं इतनी रात गए ऑफिस में बैठे ब्लॉग लिख रहा हूँ. अपने बहुत ही ख़ास दोस्त के साथ मूवी देखने गया था "अजब प्रेम की गज़ब कहानी". हालाँकि इससे पहले भी मैं भी ये मूवी देख चुका हूँ. पर आज मेरे दोस्त के कैट के इम्तिहान ख़त्म हुए तो उसके साथ जाना पड़ गया. मना करने का सवाल ही नहीं उठता, आखिर ख़ास जो ठहरा. मूवी देखते हुए उसने भी आज की पीढ़ी के बदले हुए मिजाज़ की बात कही. उसने कहा कि आज-कल की फिल्म्स में कहानी थोड़ी बदल गयी है, हीरो-हीरोइन अब एक-दूसरे प्यार नहीं करते. फिल्म की कहानी में शुरुआत से लेकर, आखिर के थोड़े पहले तक वो किसी और से प्यार करते हैं और फिल्म के ख़त्म होते-होते उन्हें एक-दूसरे से प्यार हो जाता है. आज की पीढ़ी का मिजाज़ भी कुछ ऐसा ही हो गया है शायद, वो किसी को प्यार करते-करते किसी और से प्यार कर बैठते हैं और फिर कहानी पूरी तरह से फ़िल्मी बन जाती है. फर्क इतना होता है कि फिल्म में कौन हीरो है और कौन हीरोइन, ये सबको मालूम होता है. तीन घंटे की पटकथा का सुखान्त हो ही जाता है. पर जिंदगी की पटकथा में कौन क्या है, ये तो खुद जिंदगी भी नहीं जानती. हाँ, एक बात ज़रूर है कि इंसान अपनी चाल से चलता रहता है. इसी उम्मीद के साथ कि शायद आगे कुछ अच्छा ही होगा. पर जिसने अपनी चाल पर चलते-चलते किसी के साथ अच्छा न किया हो तो क्या उसे अच्छे की उम्मीद करनी चाहिए? सच तो ये भी है कि जो अच्छा करता है वो भी अच्छे की उम्मीद न ही करे तो बेहतर है. कई बार सारी चीज़ें, सारी बातें अपनी जगह पर एकदम सटीक होती हैं लेकिन सबके लिए सटीक हों ये ज़रूरी नहीं है. किसी को ये लगता है कि नवम्बर में होने वाली बारिश महंगाई और सूखे से राहत देगी तो किसी को लगता है कि मौसम की चाल डगमगा गयी है. किसी को फिक्र है तो कोई खौफज़दा है. किसी को लगता है कि प्यार के लिए दो पल ही काफी हैं, बाकी वक़्त दूसरे काम भी ज़रूरी हैं तो किसी को लगता है कि प्यार के लिए 24 घंटे भी कम हैं. किसी को लगता ही कि खुद के प्रति लापरवाह रवैया आपकी पहिचान मिटा देगा तो किसी को लगता है कि दूसरों का उसके प्रति लापरवाह रवैया उसकी पहिचान मिटा देगा. कोई स्वार्थी है, कोई कम स्वार्थी और कोई ज्यादा स्वार्थी हैं. कोई खुद के लिए है, कोई अपने परिवार के लिए. पर सब स्वार्थी हैं. सब को कुछ न कुछ चाहिए. कुछ को सब कुछ मिल जाता है तो किसी को कुछ भी नहीं. ऐसा भी कई बार होता है कि आपके हाथ की चीज़ किसी और के हाथ में चली जाये या कोई और उसे छीन ले. थोड़े देर पहले आप मुस्कुरा रहे होते हैं तो थोड़ी देर बाद ग़मगीन हो जाते हैं. मिजाज़ किसी का भी हो, बदलने में वक़्त नहीं लगता. मौसम तो हमें सिखाता है कि बदलती हुई चीज़ों का सामना हम कैसे कर सकते हैं, हाँ! ये अलग बात है कि कई बार हम बारिश में ज्यादा भीग जाते हैं तो कभी कम. लेकिन भीगते ज़रूर हैं. मैं भी तो बदले हुए मिज़ाज़ की बदौलत ही तो  यहाँ बैठा हुआ हूँ. मेरे पास दो ही विकल्प हैं, या तो बारिश में बाहर निकल जाऊं या फिर बारिश के बंद होने का इंतज़ार करूँ. ये भी मिज़ाज़ की बात है.

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

इस्तीफा

Dear Sir,
पिछले कई महीनों में मैंने आपको अपनी व्यवसायिक समस्याएं व्यक्तिगत तौर पर बताने के बाद ही ई-मेल का सहारा लिया था. पर अब तक किसी तरह का ठोस समाधान मुझे नहीं दिया गया है. मौखिक तौर पर जो भी बातें अब तक सामने आयीं, जैसे कि - ऊपर वाले कुछ कर रहे हैं, ऊपर बात हुई है उन्होंने कहा है कि कुछ करते हैं. इत्यादि.  पर अब तक क्या हुआ है, कुछ भी जानकारी नहीं दी गयी है.  कुछ चीज़ें जो मैंने आपसे मांगी हैं, वो increment, appraisal, promotion और bonus हैं. कोई भी मेहनती, ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी अपनी कंपनी से शायद इन्ही चीज़ों की मांग करता है. मैं ये पूछते-पूछते हताश हो चुका हूँ कि क्या कंपनी मेरे  लिए कुछ कर रही है, हाँ या न? कोई जवाब नहीं मिला है. और जवाब न मिलने से मनोबल लगातार गिर रहा है और मानसिक परेशानी भी बढ़ रही है. मानसिक तनाव के चलते मेरा व्यक्तिगत जीवन भी प्रभावित हो रहा है. इस परेशानी को बर्दाश्त करने की मुझमें हिम्मत बहुत है लेकिन अब मैं इसे और बर्दाश्त नहीं करना चाहता. अब मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैं शुरू से लेकर अभी तक अपने कार्यों के अतिरिक्त जो कार्य (Company name) के लिए कर चुका हूँ, शायद व्यर्थ थे. चाहे वो कंपनी के लिए working hours से ज्यादा 12-14 hours काम करना हो या फिर अवकाश के दिन भी अपनी सेवाएं देने में पीछे न हटना.  कंपनी का मेरे प्रति लापरवाह रवैया होने से मेरे अन्दर का धैर्य जवाब दे चुका है और इसी धैर्य के समाप्त होने की वजह से मैं (Company name) को अपनी कर्त्व्यनिष्ठाता और कार्यों का मालिक होने के अधिकार से वंचित करता हूँ. इस वचन को संपूर्ण मानते हुए मेरे पद से मेरे इस्तीफे को मंज़ूर किया जाये. चूँकि कंपनी मेरे प्रति लापरवाह है किन्तु मुझमें थोड़ा विवेक बाकी है, अतः कंपनी को अगले सात दिनों तक मैं अपनी आपातकालीन सेवा दूंगा जिसमें कंपनी के मुझसे जुड़े हुए कार्यों का नुकसान न हो. ज्ञात हो मेरे इस कठोर कदम के लिए (Company name) का मेरे प्रति लापरवाह रवैया उत्तरदायी है जिसका ज़िक्र मैं अभी तथा पूर्व की सूचनाओं में कर चुका हूँ. मुझे उम्मीद है कि कंपनी मेरा अनुभव प्रमाण पत्र, चारित्रिक प्रमाण पत्र, वेतनमान और देयक देने में लापरवाही नहीं बरतेगी.
Regards
एक कर्तव्यनिष्ठ और मेहनती कर्मचारी.

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

समझौता एक्सप्रेस!!!

हँसी आ रही है, बहुत जोर से. और क्यों न आये? काम ही ऐसा करने जा रहा हूँ. कैसा काम है, बाद में पता चल जायेगा आपको. पर पहले ये बता दूँ कि जिंदगी में कभी-कभी ऐसा वक़्त आता है जब आपको लगने लगता है कि अब समझौता करके नहीं चला जा सकता. अब चाहे बात नौकरी की हो या फिर रिश्तों की. समझौतों से लदी ज्यादातर चीज़ें बोझ बन जाता हैं. कुछ महीनों से इस समझौते की उहा-पोहं में खुद को खोता सा जा रहा था. इतनी बड़ी कीमत,  वो भी समझौता एक्सप्रेस चलाने के लिए. न, नहीं, नो, नेवर. आप एक अभिनेता हो सकते हैं, एक नेता हो सकते हैं, एक उद्योगपति हो सकते हैं, एक बड़े पद पर अधिकारी हो सकते हैं. लेकिन इन सबकी कीमत आपको खुद की पहचान खोकर चुकानी पड़े तो, हो सकता है आप सहमत भी हो जाएँ अगर कीमत अच्छी मिले. सच बताऊँ, कुछ दिन बाद आप भी ऊब जायेंगे जब महसूस होगा कि आप, आप नहीं रह गए हैं. रह गये हैं तो एक चलते-फिरते आदमी जो अपनी संस्था के निर्देशों का पालन, मुंह पर ऊँगली रखकर करता है या फिर आपको काम तब भी करना है जब करने का मन न हो. काम करने का मन दो ही स्तिथि में नहीं होता, एक जब आप खुद के काम से संतुष्ट न हो, दूसरा जब आप अपनी संस्था या वरिष्ठ अधिकारी के काम करने से संतुष्ट न हो. तीसरी स्थिति भी हो सकती है जब पहली और दूसरी एक साथ सामने आ जाएँ. हँसी अभी भी आ रही है, काम ही ऐसा करने जा रहा हूँ. समझौतों से मुक्त होने का काम. मतलब समझौता एक्सप्रेस अब जाकर यार्ड में खड़ी हो जायेगी और मैं स्वतंत्रता से खुले आसमान में सांस ले पाउँगा.

सोमवार, 21 सितंबर 2009

ऊब

आजकल लिखने का मन नहीं करता, और अगर मन होता भी है तो लिखने में वक़्त नहीं दे पाता. पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि कुछ अच्छा लिखूं. पर अच्छा क्या होता है? क्या अच्छा लिखने से कुछ अच्छा हो सकता है? मतलब अगर मैं कुछ लिख रहा हूँ और आप उसे पढ़ रहे हैं तो क्या उस लेख पर टिप्पणी करने के बाद आप फुर्सत हो जाते हैं अपने कर्तव्य से ? खैर मेरी छोड़िये, मैं तो जो लिखता हूँ बकवास ही लिखता हूँ पर आप जो अखबार पढ़ते हैं, कुछ अच्छे न्यूज़ चैनल देखते हैं. क्या उनमें भी सबकुछ बकवास ही होता है? मेरे लिए कुछ ख़बरों को छोड़कर बाकी सबकुछ ठीक-ठाक होता है अखबार और न्यूज़ चैनल में. नेता अपना काम कर रहे हैं (मतलब वो खबर बनने की पूरी कोशिश करते हैं.) और पत्रकार अपना काम करते हैं (कुछ खबर लाते हैं, कुछ खबर दबा जाते हैं , कुछ खबर बनाते हैं और  कुछ खबर बनने ही नहीं देते.). बाकी बची हमारी आम जनता "the mango people", इनका काम सबसे ज्यादा कठिन होता है. पांच साल में एक बार नेता चुन लिया और अपने काम से लग गए. बहुत काम होता है आम जनता के पास, जैसे सुबह सोकर उठाना, अखबार खरीद कर पढना और चाय की चुस्कियां लेते हुए कहना...ये नेता लोग एक दिन देश को खा जायेंगे और ये अखबार वाले कुछ भी छापते रहते हैं "लड़के ने कुतिया का बलात्कार किया". कुछ नहीं हो सकता इस देश का.  थोडी देर में  नौकरी पर जाने का वक़्त हो जायेगा, तब नहा-धोकर, नाश्ता करके, टिफिन लेकर ये कहते हुए निकलेंगे...Oh God! देर हो रही है. जल्दी से अपना two wheeler स्टार्ट करके, बच्चों को टा टा कहेंगे और अगर बीवी होगी तो एक smile देकर फटाक से निकल जायेंगे. (ये वाली कंडिशन्स अलग हो सकती हैं, नयी बीवी और पुरानी बीवी को response करने में कुछ फर्क हो सकता है.) खैर अपनी गड्डी लेकर जब mango people आगे बढ़ते हैं तो बंद रेलवे फाटक को खुद झुककर और गाड़ी को तिरछा करके निकाल लेते हैं. थोड़ी आगे के चौराहे पर एक यातायात पुलिसकर्मी गाड़ी रोक कर ड्राइविंग लाईसेन्स की मांग करता है तब मालूम पड़ता है कि वो जल्दी-जल्दी में घर पर ही छूट गया. फिर क्या है, एक पचास का नोट देकर चालान से मुक्ति पा लेते हैं. अरे! पान थूकने का सीन तो रह ही गया, पचाक! ये लो ये भी पूरा हो गया. दफ्तर पहुंचकर कुछ पुराने काम पेंडिंग पड़े हुए हैं जिनका खर्चा बड़े साब के पास पहुँच गया है, तो लगे हाथ काम पूरा करके अपना हिस्सा लेकर शाम की सब्जी-भाजी का इंतजाम कर लिया. शाम को घर लौटते वक़्त, रास्ते में लघुशंका लग आई, बस गाड़ी किनारे लगाकर कहीं भी खड़े हो गए. न तो खुद को रोक सकते हैं और न ही कोई रोकने-टोकने वाला है. थोड़ी देर में घर पहुंचकर बीवी को टेलिविज़न पर प्राइम टाइम शो के साथ चिपके हुए देखते हैं. जब खाना खाने का मन किया तब बीवी डिनर टेबल सजाकर खाना खिला कर, बच्चों को सुलाकर कहेगी... सुनोजी! शक्कर-दाल-रसोई गैस सब महंगे हो गए हैं, इस बार घर के बजट के लिए थोड़े एक्स्ट्रा पैसे चाहिए होंगे. थोड़ी देर यहाँ-वहां कि बातें करते हुए रूम का लाइट ऑफ़ हो जायेगा. ये एक कॉमन लाइफ है, कॉमन मैन "द मैंगो पीपल" की. जनाब, जब खुद इंसान अपने घर की ज़िम्मेदारी सीधे तरीके से नहीं निभा पाता तो वो दूसरो से क्यों उम्मीद करता है कि वो देश की ज़िम्मेदारी सीधे ढंग से निभाएं? जब घर चलाने के लिए काला-पीला करना पड़ता है तो देश चलाने के लिए काला-पीला करने वालों से परहेज़ क्यों? एक फिल्म आयी थी " अ वेडनेसडे" जिसमें नसीरुद्दीन साहब का एक संवाद था, "आम आदमी conditions से adjust कर लेते हैं, उससे लड़ने की कोशिश नहीं करते, मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं निकल गया लड़ने के लिए."

सच बताऊँ, तो मैं भी ऊब चुका हूँ adjust करते हुए और दूसरों को adjustment करते हुए देखकर और ये ऊब बहुत जल्दी ख़त्म होने वाली है.