Blog of the month for February 2010
बेचैनी के सभी पाठकों और Blog of the month foundation को बहुत-बहुत धन्यवाद.
ज़िंदा होने का प्रमाण है बेचैनी, विचारों में उथल-पुथल की ज़िम्मेदार है बेचैनी, जीवन को गति देने का काम करती है बेचैनी, परिवर्तन को हवा देती है बेचैनी...
बुधवार, 3 मार्च 2010
मंगलवार, 2 मार्च 2010
मंज़र
कहते हैं आँखों देखा भी यकीन के काबिल नहीं होता,
ये कहकर खुदको तसल्ली देना ठीक है...
पर ज़रूरत क्या है देखने की,
जब देखना ही तकलीफ देने लगे...
ये कहकर खुदको तसल्ली देना ठीक है...
पर ज़रूरत क्या है देखने की,
जब देखना ही तकलीफ देने लगे...
सोमवार, 1 मार्च 2010
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
चाँद की शरारत
चाय पीने के लिये दफ्तर से बाहर निकला तो देखा,
कि आज चाँद पूरा है फ़लक पर,
और झाँक रहा है ज़मीन की तरफ,
कुछ आगे बढ़ा तो पता चला कि,
तुम्हारी छत के बहुत नज़दीक है चाँद,
और ताक रहा है कि कब तुम ऊपर आओ,
चाँद भी बेहद शरारती हो गया है.
कि आज चाँद पूरा है फ़लक पर,
और झाँक रहा है ज़मीन की तरफ,
कुछ आगे बढ़ा तो पता चला कि,
तुम्हारी छत के बहुत नज़दीक है चाँद,
और ताक रहा है कि कब तुम ऊपर आओ,
चाँद भी बेहद शरारती हो गया है.
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
शहीदों का सम्मान
ग्वालियर में सचिन का दोहरा शतक एक वर्ल्ड रिकॉर्ड है. इसमें कोई शक नहीं कि सचिन ने एक महान पारी खेली है. सचिन के इस दोहरे शतक का जश्न भारतीय अगले दो दिन तक ज़रूर मनाएंगे. हालाँकि सचिन ने जिस दिन इतिहास रचा उस दिन भारतीय रेल मंत्री ममता बेनर्जी भी अपने रेल बजट की पारी खेल रही थीं, और उनके इस रेल बजट का असर भारतीयों पर अगले एक साल तक ज़रूर रहेगा. वैसे आज के अखबारों और न्यूज़ चैनल्स में क्रिकेट और रेल बजट जैसी दो चीज़ें प्रमुखता से दिखाई जा रही हैं लेकिन कल के ही दिन श्रीनगर में एक आतंकी हमले के दौरान शहीद हुए सेना के कैप्टेन देविंदर सिंह जास,नायक सेल्वा कुमार और पैराट्रूपर इम्तियाज़ अहमद थोकर के बारे में बहुत कम अखबारों और न्यूज़ चैनल्स ने कवरेज दिया. बहुत दुःख की बात है कि हमारे देश के असली नायकों के लिए ज़्यादातर लोगों के पास वक़्त नहीं है. अब चाहे वो मीडिया ही क्यों न हो. शायद यही कारण भी है कि भविष्य बनाने के मामले में हमारे देश की युवा पीढ़ी की रूचि राजनीति, मनोरंजन और खेल के क्षेत्र में ज्यादा है जबकि सेना में जाने के लिए उनमें उत्साह काफी कम है. मेरा उद्देश्य सचिन के खेल की अहमियत कम करना नहीं है, मैं चाहता हूँ कि लोग उनका भी सम्मान करें जिनकी वजह से भारत के करोड़ों लोग बिना किसी डर के अपने-अपने टीवी सेट्स पर सचिन की सेंचुरी और शाहरुख़ की एक्टिंग देखते हैं. उन शहीदों को शत-शत नमन.
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
अकेलापन
दिन भर के बाद जब शाम को घर जाता हूँ,
तो सबसे पहले घर के ताले से रु-बा-रु होता हूँ,
और जब दाखिल होता हूँ अन्दर,
तब घर से सामना होता है मेरा,
सुबह से मेरे जाने के बाद,
कोई होता नहीं है उससे बतियाने को,
इसलिए शाम को मुझे देखते ही,
उसका मुँह सूज जाता है,
सारी नाराज़गी मुझ पर ज़ाहिर करता है,
एक बात बताऊँ,
उस घर के दांत नहीं हैं,
फिर भी वो मुझे काटने को दौड़ता है.
तो सबसे पहले घर के ताले से रु-बा-रु होता हूँ,
और जब दाखिल होता हूँ अन्दर,
तब घर से सामना होता है मेरा,
सुबह से मेरे जाने के बाद,
कोई होता नहीं है उससे बतियाने को,
इसलिए शाम को मुझे देखते ही,
उसका मुँह सूज जाता है,
सारी नाराज़गी मुझ पर ज़ाहिर करता है,
एक बात बताऊँ,
उस घर के दांत नहीं हैं,
फिर भी वो मुझे काटने को दौड़ता है.
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