शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

समझौता एक्सप्रेस!!!

हँसी आ रही है, बहुत जोर से. और क्यों न आये? काम ही ऐसा करने जा रहा हूँ. कैसा काम है, बाद में पता चल जायेगा आपको. पर पहले ये बता दूँ कि जिंदगी में कभी-कभी ऐसा वक़्त आता है जब आपको लगने लगता है कि अब समझौता करके नहीं चला जा सकता. अब चाहे बात नौकरी की हो या फिर रिश्तों की. समझौतों से लदी ज्यादातर चीज़ें बोझ बन जाता हैं. कुछ महीनों से इस समझौते की उहा-पोहं में खुद को खोता सा जा रहा था. इतनी बड़ी कीमत,  वो भी समझौता एक्सप्रेस चलाने के लिए. न, नहीं, नो, नेवर. आप एक अभिनेता हो सकते हैं, एक नेता हो सकते हैं, एक उद्योगपति हो सकते हैं, एक बड़े पद पर अधिकारी हो सकते हैं. लेकिन इन सबकी कीमत आपको खुद की पहचान खोकर चुकानी पड़े तो, हो सकता है आप सहमत भी हो जाएँ अगर कीमत अच्छी मिले. सच बताऊँ, कुछ दिन बाद आप भी ऊब जायेंगे जब महसूस होगा कि आप, आप नहीं रह गए हैं. रह गये हैं तो एक चलते-फिरते आदमी जो अपनी संस्था के निर्देशों का पालन, मुंह पर ऊँगली रखकर करता है या फिर आपको काम तब भी करना है जब करने का मन न हो. काम करने का मन दो ही स्तिथि में नहीं होता, एक जब आप खुद के काम से संतुष्ट न हो, दूसरा जब आप अपनी संस्था या वरिष्ठ अधिकारी के काम करने से संतुष्ट न हो. तीसरी स्थिति भी हो सकती है जब पहली और दूसरी एक साथ सामने आ जाएँ. हँसी अभी भी आ रही है, काम ही ऐसा करने जा रहा हूँ. समझौतों से मुक्त होने का काम. मतलब समझौता एक्सप्रेस अब जाकर यार्ड में खड़ी हो जायेगी और मैं स्वतंत्रता से खुले आसमान में सांस ले पाउँगा.

सोमवार, 21 सितंबर 2009

ऊब

आजकल लिखने का मन नहीं करता, और अगर मन होता भी है तो लिखने में वक़्त नहीं दे पाता. पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि कुछ अच्छा लिखूं. पर अच्छा क्या होता है? क्या अच्छा लिखने से कुछ अच्छा हो सकता है? मतलब अगर मैं कुछ लिख रहा हूँ और आप उसे पढ़ रहे हैं तो क्या उस लेख पर टिप्पणी करने के बाद आप फुर्सत हो जाते हैं अपने कर्तव्य से ? खैर मेरी छोड़िये, मैं तो जो लिखता हूँ बकवास ही लिखता हूँ पर आप जो अखबार पढ़ते हैं, कुछ अच्छे न्यूज़ चैनल देखते हैं. क्या उनमें भी सबकुछ बकवास ही होता है? मेरे लिए कुछ ख़बरों को छोड़कर बाकी सबकुछ ठीक-ठाक होता है अखबार और न्यूज़ चैनल में. नेता अपना काम कर रहे हैं (मतलब वो खबर बनने की पूरी कोशिश करते हैं.) और पत्रकार अपना काम करते हैं (कुछ खबर लाते हैं, कुछ खबर दबा जाते हैं , कुछ खबर बनाते हैं और  कुछ खबर बनने ही नहीं देते.). बाकी बची हमारी आम जनता "the mango people", इनका काम सबसे ज्यादा कठिन होता है. पांच साल में एक बार नेता चुन लिया और अपने काम से लग गए. बहुत काम होता है आम जनता के पास, जैसे सुबह सोकर उठाना, अखबार खरीद कर पढना और चाय की चुस्कियां लेते हुए कहना...ये नेता लोग एक दिन देश को खा जायेंगे और ये अखबार वाले कुछ भी छापते रहते हैं "लड़के ने कुतिया का बलात्कार किया". कुछ नहीं हो सकता इस देश का.  थोडी देर में  नौकरी पर जाने का वक़्त हो जायेगा, तब नहा-धोकर, नाश्ता करके, टिफिन लेकर ये कहते हुए निकलेंगे...Oh God! देर हो रही है. जल्दी से अपना two wheeler स्टार्ट करके, बच्चों को टा टा कहेंगे और अगर बीवी होगी तो एक smile देकर फटाक से निकल जायेंगे. (ये वाली कंडिशन्स अलग हो सकती हैं, नयी बीवी और पुरानी बीवी को response करने में कुछ फर्क हो सकता है.) खैर अपनी गड्डी लेकर जब mango people आगे बढ़ते हैं तो बंद रेलवे फाटक को खुद झुककर और गाड़ी को तिरछा करके निकाल लेते हैं. थोड़ी आगे के चौराहे पर एक यातायात पुलिसकर्मी गाड़ी रोक कर ड्राइविंग लाईसेन्स की मांग करता है तब मालूम पड़ता है कि वो जल्दी-जल्दी में घर पर ही छूट गया. फिर क्या है, एक पचास का नोट देकर चालान से मुक्ति पा लेते हैं. अरे! पान थूकने का सीन तो रह ही गया, पचाक! ये लो ये भी पूरा हो गया. दफ्तर पहुंचकर कुछ पुराने काम पेंडिंग पड़े हुए हैं जिनका खर्चा बड़े साब के पास पहुँच गया है, तो लगे हाथ काम पूरा करके अपना हिस्सा लेकर शाम की सब्जी-भाजी का इंतजाम कर लिया. शाम को घर लौटते वक़्त, रास्ते में लघुशंका लग आई, बस गाड़ी किनारे लगाकर कहीं भी खड़े हो गए. न तो खुद को रोक सकते हैं और न ही कोई रोकने-टोकने वाला है. थोड़ी देर में घर पहुंचकर बीवी को टेलिविज़न पर प्राइम टाइम शो के साथ चिपके हुए देखते हैं. जब खाना खाने का मन किया तब बीवी डिनर टेबल सजाकर खाना खिला कर, बच्चों को सुलाकर कहेगी... सुनोजी! शक्कर-दाल-रसोई गैस सब महंगे हो गए हैं, इस बार घर के बजट के लिए थोड़े एक्स्ट्रा पैसे चाहिए होंगे. थोड़ी देर यहाँ-वहां कि बातें करते हुए रूम का लाइट ऑफ़ हो जायेगा. ये एक कॉमन लाइफ है, कॉमन मैन "द मैंगो पीपल" की. जनाब, जब खुद इंसान अपने घर की ज़िम्मेदारी सीधे तरीके से नहीं निभा पाता तो वो दूसरो से क्यों उम्मीद करता है कि वो देश की ज़िम्मेदारी सीधे ढंग से निभाएं? जब घर चलाने के लिए काला-पीला करना पड़ता है तो देश चलाने के लिए काला-पीला करने वालों से परहेज़ क्यों? एक फिल्म आयी थी " अ वेडनेसडे" जिसमें नसीरुद्दीन साहब का एक संवाद था, "आम आदमी conditions से adjust कर लेते हैं, उससे लड़ने की कोशिश नहीं करते, मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं निकल गया लड़ने के लिए."

सच बताऊँ, तो मैं भी ऊब चुका हूँ adjust करते हुए और दूसरों को adjustment करते हुए देखकर और ये ऊब बहुत जल्दी ख़त्म होने वाली है.

रविवार, 9 अगस्त 2009

लव आज-कल - नहीं बदली तो इंसान की मैन्फेक्चारिंग

"वक्त बदला, ज़रूरतें बदलीं लेकिन नहीं बदली तो इंसान की मैन्फेक्चारिंग। दिल आज भी वैसे ही धड़कता है जैसा आज से कई सालों पहले लैला-मजनू, हीर-रांझा, सोनी-माहि-वाल के समय में धड़कता था। लव, लव ही रहेगा; चाहे आज हो या कल। "

लव-आजकल देखने के बाद यही ख्याल आया। खैर, जब आप इस फ़िल्म को देखते हैं तो आपको खासी मशक्कत करनी पड़ती है इसे समझने के लिए। क्योंकि फ़िल्म का डायरेक्शन इतना उम्दा नहीं है जितनी कि इम्तियाज़ अली से उम्मीद थी। जब वी मेट और लव आजकल, कहानी, म्यूजिक, डायरेक्शन और एक्टिंग इन सब मामलों में बहुत अलग हैं। हालाँकि दोनों फिल्म्स अपनी जगह पर हैं लेकिन दोनों के डायरेक्टर एक होने कि वजह से तुलना करना वाजिब है। क्योंकि जब आपका पहला मैच धमाकेदार हो तो दूसरे मैच से लोगों की उम्मीद बढ़ जाती हैं। वैसे ये ज़रूरी है कि जब आप इस फ़िल्म को देख रहे हो, तो पूरा ध्यान फ़िल्म पर होना बहुत ज़रूरी है। फ़िल्म का पहला ट्रैक "ये दूरियां" समझने के लिए आपको पूरी फ़िल्म देखनी पड़ेगी, बिलाशक गाना बहुत अच्छा है। इसके अलावा फ़िल्म के बाकी गाने ट्विस्ट, आहूँ-आहूँ, मैं क्या हूँ, थोड़ा-थोड़ा प्यार, चोर बज़ारी, आज दिन चढीया भी आपको पसंद आयेंगे। आज दिन चढीया देखते और सुनते वक्त राहत साहब की आवाज़ आपके रोंगटे खड़े कर सकती है। फ़िल्म का आखिरी गाना, जो आहूँ-आहूँ है उसे देखने के लिए आप थिएटर में ज़रूर रुकेंगे। सैफ अली खान का डांस ट्विस्ट में ट्विस्ट नहीं डाल पाया है साथ ही सैफ ने एक्टिंग करने की पूरी कोशिश की है। दीपिका की एक्टिंग आपको पसंद आ सकती है लेकिन हरलीन का किरदार निभाने वाली गिसेल्ले मोंटिरो की खूबसूरती ही कमाल की है बाकी एक्टिंग करने के लिए उन्हें काफ़ी मेहनत की ज़रूरत है। सबको एक तरफ़ कर दिया जाए तो ऋषि कपूर साहब की एक्टिंग ज़ोरदार है। ओवर ऑल दो पीढ़ियों के बीच प्यार को लेकर दिखाई गई सोच को बखूबी परदे पर उतारने की ये कोशिश ज़ाया नहीं है, फ़िल्म आपको पसंद आएगी और आपके टिकट के लिए किया हुआ खर्च आपको फालतू नहीं लगेगा।

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

सच में तू बड़ा हो गया है...पहली किश्त

मैं ऑफिस जा रहा हूँ कुछ लाना है क्या? मैंने माँ से पूछा।माँ ने कहा " हाँ, नानी की दवाई और नाना-नानी के लिए टोस्ट और बिस्कुट, चाय के साथ लेने के लिए। गाँव भेजना है। मैंने हाँ में सर हिला दिया। माँ ने पूछा "पैसे दूँ?" मैंने कहा "हैं मेरे पास।" माँ मुस्कुरा दीं और बोली "बड़ा हो गया है तू" मैं कुछ नहीं बोला, मैं भी मुस्कुराया और बाइक उठाकर चल दिया। माँ के कहे हुए लफ्ज़ कान की दीवारों से टकराकर दिमाग के उसे कोने से जाकर टकरा गए, जहाँ कुछ यादें एक-दूसरे की गोद में सिमटी हुई थीं। उसी में से एक याद उठ खड़ी हुई और उसने आंखों की तरफ़ तेज़ी से दौड़ना शुरू किया, मैंने बाइक की रफ़्तार कम कर ली। अब तक वो याद मेरी आंखों में रफ़्तार पकड़ चुकी थी, और जहाँ से वो शुरू हुई वो दिन था 8 दिसम्बर 2006, सुबह-सुबह मेरे बिस्तर के बाजू में रखा मेरा मोबाईल बजा, पिताजी का कॉल था, कह रहे थे कि "भैया" का कॉल आया था, इस नम्बर से (उन्होंने मुझे नम्बर दिया।) भैया कह रहा था कि काम कुछ अच्छा सा नहीं लग पाया है, फिर भी कोशिश में हूँ कि अच्छा काम लग जाए। जबलपुर आने का फिलहाल कोई मन नहीं है। तुम इस नम्बर का पता करो, कहाँ का है? उसको लेकर आओ, तुम्हारे ताऊ जी कह रहे थे कि वो भी हाथ बटायेंगे सब ठीक करने में। पापा के पास भैया का ये पहला कॉल था उनके जबलपुर से जाने के बाद. मैं बिना देर किए बिस्तर से उठा, माँ को पूरी बात बताई। पापा का बताया हुआ नम्बर पता किया तो वो नागपुर का निकला, आज मैं सतना जाने वाला थे एक NGO के साथ ठेकेदारी का काम सँभालने, उसी के ज़रिये मैं अपने भाई की मदद करना चाहता था। आज जाने के लिए आठ बैग और सूटकेस के साथ पूरी तैयारी थी मेरी। माँ ने एक बैग में दो जोड़ी कपडों के साथ एक चादर रख दिया मेरे ओढ़ने के लिए। मैंने भैया के कुछ पोस्टकार्ड साइज़ फोटो रख लिए। मेन रोड पर खड़े होकर बस का इंतज़ार करने लगा, थोड़ी देर में नागपुर जाने वाली बस आ गई, मैं उस पर सवार हो गया। मैं निकल पड़ा था उस सफर में जहाँ मुझे अपने बड़े भाई तक पहुंचना था, मेरा सगा भाई जो मेरे लिए मेरा दोस्त, मेरा हमराज़, मेरा भाई सब कुछ... वो लगभग आठ महीने से लापता था, आखिरी बार मुझे मेरे दैनिक जागरण वाले ऑफिस में मिला था। उस दिन वो काफ़ी परेशान था, जब वो ऑफिस आया तो बोला, "अपनी घड़ी दे, मेरे जूते तू पहन ले और अपने जूते दे, साथ में ये मोबाईल रख बैट्री ख़त्म हो गई है इसकी। मुझे शहर का मैप बनाना है, प्रोजेक्ट के लिए। " मैंने उससे कहा, कि लूना ले जाए साथ में।" तो कहने लगा कि काम में मुश्किल होगी। मैंने कहा ठीक है, वो चला गया। रात को मैं घर पहुँचा, तब तक वो नहीं आया था। देर रात तक नहीं आया, सुबह भी नहीं आया, उसका कोई कॉल भी नहीं आया। रात से मैं और मेरी माँ परेशां थे, पिताजी उस वक्त शहर के बाहर पोस्टिंग पर थे हलाँकि उन्हें भी बता दिया था इस बारे में। दोपहर में पुलिस थाना जाकर भैया के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज करायी। उसके बाद से आज तक बस उनके आने का इंतज़ार ही कर रहे थे। मेरे भाईसाहब की किस्मत बहुत अच्छी नहीं थी, क्योंकि उन्होंने जितने भी काम किए उनमे खूब मेहनत की पर फायेदे के अलावा सब कुछ हुआ। मशरूम प्रोडक्शन, अगरबत्ती प्रोडक्शन, साइबर कैफे किसी में भी फायदा नहीं हो पाया। उल्टा क़र्ज़ में डूबते गए और क़र्ज़ लौटाया भी दस टके के ब्याज पर, अब तक वो दूसरो का पैसा दुगना कर चुके थे। फिर भी सूदखोर उनका पीछा नहीं छोड़ रहे थे, बात अब घर तक आने लगी थी। भैया काफ़ी हताश हो चुके थे। शायद इसलिए घर छोड़ दिया, हम लोगों को परेशानी न हो इसलिए आज तक घर से कोई कांटेक्ट भी नहीं किया। दोपहर से चला शाम को नागपुर पहुँचा, वहां पहुंचकर उसी नंबर पर फ़ोन किया, उसने बताया कि ये गणेश पेठ एरिया का नम्बर है। मैं भैया की फोटो लेकर उस जगह पहुँचा और लोगों को दिखाकर पूछने लगा उनके बारे में। एक दुकान में, एक बन्दा शेविंग करवा रहा था, फोटो देखकर बोला कि "ये भैया तो रोज़ मेरी दूकान के सामने सुबह नौ बजे निकलते है, बहुत अच्छे कपड़े पहनते हैं। हाथ में एक बड़ी घड़ी भी पहनते हैं। लाल रंग के बाल हैं। पर कभी किसी से बात करते हुए नहीं देखा। आप कल आ जाओ मेरी दुकान पर, वहां मिल लेना इनसे।" मैं कल होने का इंतज़ार करते हुए वहां पास के एक लोंज में जाकर रुक गया। बस यही सोच रहा था कि सवेरा कितनी जल्दी हो जाए।

रविवार, 26 जुलाई 2009

और एक बार फिर मेरी मौत हो गयी...

क्या सोचने लगे जनाब? यही कि इंसान तो एक ही बार पैदा होते है और एक ही बार मरता है लेकिन यहाँ पर "एक बार फिर मेरी मौत हो गयी" सोच कर अजीब लग रहा है? वैसे अगर लिखने वालों की बात करूँ तो ये कहना एकदम सही है कि ये मरते नहीं हैं, इनकी आत्मा किताब के पन्नो के बीच में दबी होती है और जैसे हो कोई उस पृष्ठ को खोलता है आत्मा बाहर आ जाती है। खैर, "मैं "अभी अपने शरीर में ही हूँ। एकदम सही सलामत, पर ये जो "मैं" है न, इसने खासा परेशां करके रखा है मुझे। ये "मैं " ही हर बार दम तोड़ देता है, कल रात भी ऐसा ही हुआ। फर्क इतना था कि कल रात I committed suicide और मैंने किया भी। और कल से पहले कई बार मैं बिना suicide के मारा गया। पर सवाल ये उठता है कि मैं मरता हूँ और फिर जिंदा हो जाता हूँ, कैसे? मेरा जीवन किसी पौधे के बीज की तरह है, जो एक जिंदगी के साथ धीरे-धीरे अंकुरित होता है। ये सच है कि मैं एक ही बार पैदा हुआ हूँ पर मौत कई बार हुई है। आज से कुछ साल पहले मेरे ह्रदय में मेरे बड़े भाई के लिए स्नेह का बीज जो था वो उसकी मृत्यु के पश्चात नष्ट हो गया। ये मेरी पहली मृत्यु थी। हाँ, अंश बाकी हैं अभी भी। उसके बाद फिर से किसी ने प्रेम का बीज बोया, उसका अंकुरण हो ही रहा था कि वो भी नष्ट हो गया, ये दूसरी बार मौत हुई। तीसरी बार तब जब पिता के सपनों को पूरा करने में असमर्थ रहा, चौथी बार फिर से प्रेम का अंकुरण हो ही रहा था कि वो संक्रमण का शिकार हो गया, इस प्रेम के अंकुरण पर अभी एक बात याद आ रही है। वो है एक फ़िल्म का संवाद, "लव आजकल" जिसमें ऋषि कपूर सैफ अली खान से कहते हैं, "सच्चा प्यार एक वार ही हुंदा है राजे" तो सैफ कहता है "मुझे तो कम से कम पंद्रह बार हो चुका है।" क्यों नहीं हो सकता यार, प्रकृति से सीखो... क्या धरती पर एक नस्ल के ढेर सारे पौधे नहीं हैं? हैं न! क्या कोई चीज़ दुबारा नहीं हो सकती? बेशक हो सकती हैं, भले ही एक जैसी न हो पर हो ज़रूर सकती है। खैर, बात करें अगली मौत की तो एक बहुत अजीज़ मित्र के जाने पर फिर से मौत हुई मेरी, और कल रात जब मेरे अस्तित्व को नकारा गया तो फिर मेरी मौत हो गयी। मेरी जिंदगी से जब-जब कोई जाता है, तब मेरी मौत होनी है ये मुझे मालूम है। क्योंकि मेरा जीवन इन सबसे जुडा हुआ है। मुझे मरने से बिल्कुल परहेज नहीं है क्योंकि मरने के बाद जो मेरा फिर से जन्म होता है वो पिछले से बेहतर होता है क्योंकि जिंदगी के लिए फिर से नया कुछ होता है। फर्क इतना है कि मैं अपनी पुरानी मौतें नहीं भूलता। मरने पर तकलीफ तो होती है पर हर तकलीफ में एक सबक होता है। फिर जिन्दा होता हूँ मैं मरने के लिए। इस मौत से मैंने क्या सबक लिया पता? यही कि अब मेरी अगली मौत इस वाली से अलग होगी और दुबारा मैं एक ही मौत नहीं मरूँगा। हालाँकि इतनी मौतों पर मेरी हालत कुछ ऐसी है जैसी इस शेर में कही गयी है....

मैं अपने ज़रफ से गिरता नहीं हूँ,
समंदर हूँ, कोई कतरा नहीं हूँ,
ये कहदो जाकर शहर वालों से,
मैं टूटा हूँ अभी, बिखरा नहीं हूँ...

(मजीद शोला की एक क़वाल्ली से)

शनिवार, 25 जुलाई 2009

बेवकूफ बादल

आज जब सीढ़ियों से मैं नीचे उतर रहा था, तो मेरे जूतों की हर एक ठक-ठक सीने में हथौड़े की तरह लग रही थी। वैसे तो मैं कई दफा अकेले ही सीढ़ियों से उतरा हूँ पर आज ये अकेलापन इस हद तक बढ़ गया कि जूतों की ठक-ठक मुझ पर एक ताना सा लग रही थी। " रह गए न अकेले, बेवकूफ" हर ठक पर यही ताना निकलता। इंसान ये कहकर ख़ुद को ढाढ़स बंधा सकता है कि अकेले आये हैं और अकेले जाना है तो फिर अकेले रहने से परहेज क्यों? खैर, अब तक वो जूतों की ठक-ठक मेरे ज़हन में गूँज रही है और ऐसा महसूस हो रहा है जैसे किसी ने भरे चौराहे में अपनी गन्दी गालियों से मुझे पानी-पानी कर दिया और मैं कुछ नहीं कर पाया। अब भाई, इंसान पर ख़ुद का ज़ोर नहीं चलता तो दूसरो पर क्या चलेगा? आप दूसरों को थप्पड़ मारकर आपके साथ रहने पर मजबूर तो नहीं कर सकते। दूसरों का भी अपना मन है जो किसी और के साथ रहने में ज़्यादा खुश रहता है। मेरे ख्याल से नजदीकियां इतनी हों के आप हाथ बढ़ा कर फासले को मिटा सकें लेकिन दुनिया में कोई नाप-तौल कर दोस्ती, मोहब्बत या रिश्तेदारी जैसे ताने-बाने नहीं बुनता और न ही किसी ने ऐसी नाप बनायी है। पर तब क्या जब कोई फासला ही न हो और नज़दीकियाँ इतनी जैसे बारिश की बूँद और बादल। बादल भी तो कितने वक्त तक बूँद को संभालकर रखता है, एक दिन वो बूँद भी उससे जुदा हो जाती हैं और जाकर मिल जाती हैं ज़मीन से। तकलीफ तो शायद उसे भी होती होगी, होती है शायद तभी तो कितनी ज़ोर से गरजता है बारिश के दौरान जब बूँद उससे दूर होती हैं। कभी-कभी तो बादल का गुस्सा ज़मीन पर भी बिजली बन फूट पड़ता है, इसी गम में कई महीनों तक आसमान से भी गायब हो जाता है बादल, कभी अगर आता भी है तो उस बूँद को देखने की कोशिश में थककर सो जाता है आसमान में ही और हवा उसे कहीं और बहा ले जाती है। वक्त बीतता है और फिर वही सिलसिला शुरू हो जाता है, बूँद उसके इतना नज़दीक आती है कि उसमें समां जाती है और एक दिन फिर छोड़ जाती है....तन्हा! क्या बूँद को भी बादल की याद आती होगी। शायद नहीं, क्योंकि वो तो बूँद है। जिस पर पड़ती है बिखर जाती है, ऐसे जैसे अपनी बाहें फैला दी हो उसने। बादल भी तो "बेवकूफ" है। जब मालूम है बूँद को जाना है तो सहेजता क्यों है उसे? मेरे ख्याल से बेचारा अकेले रहने से डरता है! मेरी तरह....

ये शायद मैं हूँ...

तेरे सवालों पर मेरी चुप्पी, तुमसे बहुत कुछ कहती है,
पर आज तक क्या कोई खामोशी को लफ्जों में समझ पाया है?

तेरे गुस्से पर मेरी आंखों की नमी, सावन का बादल बनकर बरसती है,
पर आज तक कौन सा बादल, धरती की तपिश को बुझा पाया है?

तेरे तकरार पर मेरे दिल की बेचैनी, ज्वर-भाटा सी घटती-बढती है,
पर आज तक कौन है जो, इससे उबर पाया है?

तेरे नफरत करने के अंदाज़ पर, एक शेर जुबां पर आया है,
पर ये शायद मैं हूँ, जो चुप रहकर ही इसे बयां कर पाया है।