सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

13 जनवरी

उस रात जैसे हैवान बैठे थे आँखों में,
जिनके बोझ से ज़मीर की पलकें बंद हो गयीं थी,
इंसानी जिस्म में उतारकर एक-दूसरे का खून पीने को बेताब थे वो,
एक मौका भी मिला, जिस छोड़ना मुमकिन न था दोनों के लिए,
गहरे दांत उतार दिए थे, रूह तक हैवानों ने,
के जिसके निशाँ अब तक झांकते हैं,
दोनों जिस्म की दरारों से,
किसी धागे सा गुच्छा बनकर, उलझ गए थे वो,
चूस लिया था मोहब्बत के हर लम्हें का कतरा,
और जब सुलझे तो, बेमानी सा कर दिया था,
वो रिश्ता,
जिसे मैंने सीने से लगाकर और तुमने छाती में छुपाकर,
पाल-पोसकर बड़ा किया था, अपने बच्चे की तरह,
वो बच्चा,
रोज़ अपनी माँ के बारे में पूछता है,
और मैं उसे बहला कर सुला देता हूँ...

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

एक बार फिर प्यार का इम्तिहान हुआ...

पिछले एक हफ्ते से चल रही break  up  की कहानी शायद आज ख़त्म हो गयी. तमन्ना तो बहुत थी कि शायद इस बार जो अंजाम होगा वो अच्छा होगा. अब जो पूरी हो जाये वो तमन्ना ही क्या? ऐसा भी सुन रक्खा है मैंने. बहुत कोशिश की,  जनाब! रात भर ठिठुरती सर्दी में बिन पानी और आग के सफलतापूर्वक survive करते रहे, लेकिन न मेमसाब आयी और न ही उनका कुत्ता. अब रात भर की तपस्या करने का मन बना ही लिया था, सोचा शायद अपने प्रेम और रिश्ते के लिए जद्दोजेहद देखकर शायद तरस आ जाये. थोड़ी देर पहले घुटनों पर बैठकर chocolate  भी भेंट की थी. लेकिन परिणाम कुछ न हुआ. कुछ छः महीने ही तो हुए थे इस रिश्ते को परवान चढ़ते, लेकिन इन छः महीनों में अपने रिश्ते की ऊंचाई देखकर अच्छे आसार की उम्मीद थी. और अभी जब वो तपस्या चल रही है "बिना अन्न, जल और निद्रा" के कथन के साथ तो शायद हो सकता है कि इस बार उन्हें हम पर तरस आ जाये. पर कोई इतना कठोर कैसे हो सकता है? कि अपने साथी को जबलपुर में हाल की जनवरी में पड़ रही सर्दी में छोड़ दे. यकीन करें या न करें सच यही है कि इतनी कठोरता आपका  अहंकार आप पर लाद देता है. पर ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती. कुछ दिन पहले publicly,  पार्किंग में एक incident हुआ, जहाँ मैडम ने कुछ ज्यादा जोर से ही अपनी frustration  हम पर निकाल दी. जब इस बात  का ज़िक्र मैंने किया तो माफी  तो दूर, आस-पास किसी तरह की शर्मिंदगी भी नहीं थी. और जब मैं पार्किंग से और आगे पूरी रात खड़ा रहा तो उन्हें अपनी image और dignity  की चिंता हो गयी. पार्किंग के पुराने वाले incident  में लापरवाही देखते हुए ही break up  जैसी चीज़ को मैंने आगे किया और उन्होंने भी उसे follow  किया. हो सकता है आप सोच रहे हों की इतनी सी बात में break  up  जैसा कठोर निर्णय? तो शायद आपके लिए ये जानना बेहतर होगा कि, मोहतरमा को मेरा मोबाइल देखने का बड़ा शौक है, कोई भी msg  आये तो सबसे पहले उन्हें देखना है कि किसका है. कोई कॉल आये तो उन्हें सबसे पहले इत्तिलाह करनी होती थी कि फलां का कॉल है. हालाँकि इससे मुझे रत्ती भर भी परेशानी नहीं थी. हाँ, उन्हें एक विशेष नंबर से मेरे मोबाइल पर आने वाले कॉल और msg  से चिढ थी. तो मैं भी उस नंबर को ignore  करता था. ज़ाहिर सी बात है कोई न कोई पुराने थिगड़े आपके कपड़ों पर लटक ही जाते हैं, तो मैडम के केस में भी एक नंबर ऐसा ही था, जिसको entertain  करने पर मेरे नाक-मुँह सिकुड़ते थे. पर शायद उन्हें उस नंबर से कुछ ज्यादा ही मोह था. अब कहाँ हम छोटे शहर के और वो नंबर वाले मेट्रो सिटी के. हम ठहरे civillien और वो इसके opposite . मैडम ने तो एक दिन तो हमारे मित्रों के सामने ये भी कह दिया था कि मेट्रो सिटी कालर ignore  नहीं किया जा सकता क्योंकि हमसे पहले कहानी वहां लिखी जाने वाली थी. मैंने इस बात पर नहीं टोका, मुझे लगा कि धीरे-धीरे सब सुधर जायेगा. बाद में कई बार इस बात पर बहस होती थी लेकिन बेनतीजा. ये कम पड़ नहीं रहा था, ऊपर से हमारा गुस्सा. न चाहते हुए भी दो-तीन बार हाथापाई की नौबत भी आ गयी. काफी बुरा लगा मुझे और सबसे ज्यादा उन्हें. पर ऐसा नहीं है कि लड़ने के बाद रिश्ते में कोई कमी रह जाये. उसके बाद भी जी-जान से लगे रहते थे कि खुशियाँ बटोरने में कोई कमी न रह जाये. एक हफ्ते पहले शुरू हुई break up की बात को दो-तीन बीते थे, कि एक रात में जब उनके घर में था तो वही मेट्रो सिटी caller रात को ढाई बजे से जो शुरू हुआ तो सवा तीन बजे तक उनके मोबाइल पर रिंग पे रिंग दे. जब मैंने मोबाइल उठाकर देखना चाह तो उन्होंने छीनने की कोशिश की और इस छीना-झपटी में हाथ-पाँव भी चल गए. बात यहाँ से बिगड़ गयी. उस दिन मुझे पता चला कि मैडम का मोबाइल अगर मैं भी उठों तो मैडम को COMFORTABLE feel  नहीं होता. अब तक कहीं भी कोई बड़ी बात नहीं हुई है जो वाकई में इतनी बड़ी हो कि अलग हुआ जाये. खैर मैं खुदको सजा दे चुका हूँ, अपने हाथ दीवार पर मार-मार कर उन्हें सुजा दिया है और पूरी रात सर्दी में खड़े रहकर बाकी कसार भी पूरी कर दी. अब भी यही कोशिश कर रहा हूँ कि सारे मसले सुलझ जाएँ, पर उन्होंने कह दिया कि "Things are not working between us." देखिये कोशिश तो पूरी है कि इस बार इतिहास न दोहराया जाये, अगर ऐसा हुआ तो अपनी कहानी फिर अधूरी रह जाएगी  और प्यार के इम्तिहान में जीरो से ज्यादा स्कोर नहीं हो पायेगा. हो सकता है आपको सब-कुछ मजाक लग रहा हो लेकिन लिखते वक़्त उँगलियों और दिल का दर्द मैं जानता हूँ.

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

जाना तो नहीं चाहता लेकिन फिर भी चला जा रहा हूँ...

आधी रात के घने कोहरे और ठिठुरन भरे माहौल में  भागती ट्रेन की सीटी और इसके पहियों की आवाज़ सन्नाटे को चीरते हुए पटरी के आस-पास बने घरों से टकरा रही थी.इस वक़्त ट्रेन की आवाज़ सुनकर लग रहा था मानो,  कड़कड़ाती ठण्ड ने उसके दांत जमाँ दिए हों और वो गर्माहट पाने के लिए गुहार लगा रही हो. अभी थोड़ी देर पहले ही मैं पटरी के पास वाले घर पहुंचा था और इस ख्याल में डूबा था कि व्यर्थ अहंकार, अभिमान और नासमझी के बादलों से होने वाली हलकी-फुल्की बूंदा-बंदी जब तेज़ बारिश की शक्ल अख्तियार करती है तो प्यार और अपनेपन की ज़मीन में पनपने वाले रिश्ते उसमें या तो डूब जाते हैं या फिर बह जाते हैं. दोनों ही स्थिति में नुकसान रिश्तों का होता है और हर नुकसान की भरपाई हो ये मुमकिन भी नहीं है.

स्तब्ध और आंसुविहीन, इससे लाचार हालत और क्या हो सकती है? कुछ छः महीने ही हुए थे उससे  मिले हुए और मिलते वक़्त आप कभी बिछड़ने के बारे में नहीं सोचते. वैसे आजतक ये निश्चित नहीं हो पाया कि हमारे रिश्ते की पहल किसने की? मैंने या उसने? लेकिन ये ज़रूर है कि अलग होने का निर्णय मेरा था. दिन, हफ्ते, महीने छोटी-छोटी नोक-झोंक तो होती थीं लेकिन बात यहाँ तक आ पहुंचेगी सोचा नहीं था. "हम दोनों बहुत अलग हैं" कई बार ये सुन चुका था उससे. लेकिन क्या दुनिया मैं हम ही अलग हैं? "मैं ऐसी ही हूँ" ये भी कई बार सुना था और इसके बाद ये भी सुना कि जब तुम्हे मालूम था कि "मैं ऐसी हूँ तो फिर ज़रूरत क्या थी साथ होने की और तुम्हें ये आज ही दिख रहा है कि मैं ऐसी हूँ पहले नहीं दिखा". खैर, आप इंसान से जीत सकते हैं उसके अहंकार से नहीं. वैसे रिश्तों में सही-गलत, हार-जीत जैसा कुछ नहीं होता, जो होता है वो है समझ. मैं उसे समझ तो गया था लेकिन इस उम्मीद के साथ कि शायद उसमें कोई सुधार आएगा. वो खुद में सुधार करने  तैयार नहीं थी. जब आप किसी से मिलते हैं तो मिलते ही साथ उससे ऐसा कुछ नहीं कहते कि उसे कुछ बुरा लगे, वरना आपकी अगली मुलाकात उससे होगी या नहीं, ये पक्का नहीं होता. कुछ लोग खुद से बहुत प्यार करते हैं, खुद की हर चीज़ उन्हें बहुत प्यारी होती है. हिटलर को भी अपनी छोटी सी मूंछ से बड़ा प्यार रहा होगा लेकिन किसी ने उसे ये बताने की हिम्मत नहीं की कि वो मूंछ बहुत अजीब लगती थी, अपनी जान किसे प्यारी नहीं होती? बहुत कम लोग जानते हैं कि हिटलर एक बहुत अच्छा "चित्रकार" भी  था और paint brush  बहुत ख़ूबसूरती से use  करना जानता था. खुद के वजूद को कौन नहीं चाहता? पर ये चाहत, उसे चाहने के आड़े आने लगे तो क्या किया जाये? पहले तो आप उसे नज़रंदाज़ करेंगे, फिर अगर कुछ ज्यादा ही महसूस होने लगे तो सुधारने की कोशिश करेंगे और जब सब तरह से विफल हो जाएँ तो हाथ खड़े कर देंगे. लोगों को कहते सुना है  "मैं आपके दिल में रहना चाहता हूँ", शायद दिल भी एक घर होता है. आप किस घर में जिंदगी भर रहना चाहेंगे ? एक ऐसा घर जिसकी नीवं कमज़ोर हो, जिसके ज़मीने पत्थर हिले हुए हों या फिर एक ऐसा घर जिसकी नीवं को कोई सुनामी, कटरीना, डैज़ी और भूकंप हिला न सके? नीवं मज़बूत की जा सकती है, जब घर बनना शुरू हुआ हो और मैं ये भी सोच रहा हूँ कि एक कोशिश अभी भी की जा सकती है. जबकि सारे प्रयत्न बेकार जा चुके हैं, आखिरी वाला भी. पूरी रात आँखों में कट गयी और सुबह ने खिड़की पर दस्तक दी. मेरे यहाँ से चलने का वक़्त भी हो गया. मैं जा रहा हूँ, मैंने किसी के आवाज़ देने का इंतज़ार भी नहीं किया और किसी ने मुझे आवाज़ भी नहीं दी. जाना तो नहीं चाहता लेकिन फिर भी चला जा रहा हूँ...

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

तुम्हारे नाम

तुम, 

"कभी-कभी आपको वो भी करना पड़ता है, जो आपने सोचा न हो." अपनी बात करूँ तो ऐसा ही लग रहा है अभी कि जो कुछ अब मैं लिखने वाला हूँ, कभी सोचा नहीं था कि इस तरह से भी लिखना पड़ सकता है. जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि अपनी परेशानियाँ यहाँ लिखते वक़्त कुछ हल्का सा लगने लगता है. ये  गलतफहमी भी हो सकती है लेकिन लगता तो कुछ ऐसा ही है. हाड़-मांस के ढाँचे में रहते हुए ये भी लगने लगा है कि अपनी परेशानी को शाब्दिक रूप देकर, शायद उसे आसानी से सुलझाया जा सकता है. अब ये तो आगे ही पता चलेगा कि ये दुबारा उलझने के सुलझेगी या फिर और उलझती जाएगी.
मैंने ऐसा कहीं सुना था कि बातचीत से दो देशों के बीच के झगड़े, मसले और मुद्दे सुलझ जाते हैं. पर मेरा मसला बातचीत से कभी सुलझता ही नहीं है. बातचीत, वो क्या होती है...जब भी होती है सिर्फ बहस ही होती है. लेकिन इतना ज़रूर है कि शुरुआत बातचीत से ही होती है. मसला भी कोई बड़ा मसला नहीं है, लेकिन इस मसले की अहमियत बहुत है. मसला यही है कि " जब भी तुम मुझसे दूर जाते हो, अपने ज़हन से मुझे निकाल कर कहीं बाहर फेंक जाते हो." आज तक तो मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं हमारे रिश्ते को ढो रहा हूँ पर जाने क्यों मुझसे दूर जाने के बाद तुम माथे का पसीना पोछते हुए नज़र आते हो. छोटे शहर के लोगों में attitude नहीं होता, वो Emotional fool होते हैं. बेहद प्यार करने और बेहिसाब नफरत करने की quality सिर्फ छोटे शहर के लोगों में ही होती है और इसी वजह से वो अपने रिश्तों में या तो बहुत सफल होते हैं या फिर बहुत असफल. रिश्तों का ताना-बाना बुनते वक़्त वो ये भूल जाते हैं कि वो "बुनकर" या "जुलाहा" नहीं हैं, जो कहीं भूल-चूक हो जाने पर बिना गठान बांधे दुबारा रिश्तों को बुन सकते हैं. कहीं गठान न बांधनी पड़े इसके लिए भी मैं हमेशा तैयार रहता था, Adjustment  क्या होता है ये उनसे पूछो जो थोड़े से adjustment में अपनी पूरी जिंदगी साथ जीने के लिए तैयार रहते हैं पर उन्हें ये उनके नसीब में Adjustment जैसी कोई चीज़ नहीं होती. अगर कोई कहता है कि Adjustment जैसी कोई भी चीज़ रिश्तों में नहीं होती तो शायद उन्हें ये नहीं मालूम है कि जब भी दुनिया में दो अलग-अलग चीज़ें मिलती हैं तो उनमें Adjustment होता है. भौतिकी के समायोजन का सिद्धांत मानव जीवन के रिश्तों पर भी लागू होता है. पर इसका एक लेवल होता है, ये सिद्धांत इतना भी न लागू होने लगे कि Relation  किसी Technical machine जैसा लगने लगे. कभी गौर किया है तुमने, जब भी हम करीब होते हैं तो Communication का एक तार सा जुड़ा होता है. जो दूर जाते ही टूट जाता है और दूर जाने पर सबसे ज्यादा जिस चीज़ का ज़रूरत होती है वो कम हो जाये तो चलता है लेकिन बिलकुल ख़त्म हो जाये तो तकलीफ होती है. दिन में तुम अपने दोस्तों के साथ हो, शाम को परिवार  के साथ, रात में फ़ोन पर या फिर थक जाने के बाद नींद की आगोश में. फिर मैं कहाँ हूँ? ठीक है एक-दो दिन चलाया जा सकता है. फिर जब भी बात हो तो ऐसी क्यों कि जैसे मैं तुम्हारे लिए अनजान हूँ? प्यार नाम का कुछ तो है हमारे बीच, पर वो तो नदारद हो जाते हैं तुम्हारे जाते ही. एक सच और है जो तुम्हे भी मालूम है कि तुम बहुत ज़िद्दी हो. अब चाहें वो ज़िद सही बात को न मानने की हो या फिर गलत बात मनवाने की. मुझे उम्मीद है कि तुम्हे मेरी बातें समझ आ गयी होंगी.


मैं 

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

ईमेल

सुबह -सुबह एक ईमेल की दस्तक पर, जब इनबॉक्स खोला,
तो देखा, बहुत सारे स्पाम भी आये हैं,
सब्जेक्ट से आकर्षक थे सारे,
जो पहले भी थे आये,
हेडर देखा फुटर देखा,
पूरा मेल पढ़ कर देखा,
तो पता चला,
किसी के बैंक अकाउंट में, बहुत सारा पैसा था,
जिसे हांसिल करने के लिए मेरा सहारा चाहिए,
रकम तो इतनी थी कि जिसे आज तक मैंने सुना न था,
अचानक से याद आया कि,
अखबार में कुछ दिनों पहले,
ऐसे ही किसी ईमेल फ्रौड की खबर आई थी,
फिर भी लगा कि हर बार फ्रौड थोड़े ही होता है,
स्टार का टैग लगा कर अकाउंट साईन आउट कर दिया,
जब भी साईन इन करता,
तो बस उस मेल पर ही नज़र जाती,
दो हफ्ते बीत गए,
सोचा उस मेल का रेप्लाए किया जाये,
लेकिन उस दिन अखबार में फिर एक खबर आ गयी,
"ईमेल के ज़रिये फ्रौड करने वाला गिरफ्तार"
फ्रौड है शायद, फ्रौड ही होगा,
इस तरह इन्टरनेट पर अगर अमीर बनने की तरकीब होती,
तो भिखारी कटोरे की जगह, लैपटॉप लेकर घूमते.

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

मिज़ाज़

पिछले दो दिनों से, जब से मैं शहर लौट कर आया हूँ, बहुत कुछ बदल गया है. मौसम का मिज़ाज़ भी उनमें से एक है और इस बदले हुए मिज़ाज़ की वजह से ही तो मैं इतनी रात गए ऑफिस में बैठे ब्लॉग लिख रहा हूँ. अपने बहुत ही ख़ास दोस्त के साथ मूवी देखने गया था "अजब प्रेम की गज़ब कहानी". हालाँकि इससे पहले भी मैं भी ये मूवी देख चुका हूँ. पर आज मेरे दोस्त के कैट के इम्तिहान ख़त्म हुए तो उसके साथ जाना पड़ गया. मना करने का सवाल ही नहीं उठता, आखिर ख़ास जो ठहरा. मूवी देखते हुए उसने भी आज की पीढ़ी के बदले हुए मिजाज़ की बात कही. उसने कहा कि आज-कल की फिल्म्स में कहानी थोड़ी बदल गयी है, हीरो-हीरोइन अब एक-दूसरे प्यार नहीं करते. फिल्म की कहानी में शुरुआत से लेकर, आखिर के थोड़े पहले तक वो किसी और से प्यार करते हैं और फिल्म के ख़त्म होते-होते उन्हें एक-दूसरे से प्यार हो जाता है. आज की पीढ़ी का मिजाज़ भी कुछ ऐसा ही हो गया है शायद, वो किसी को प्यार करते-करते किसी और से प्यार कर बैठते हैं और फिर कहानी पूरी तरह से फ़िल्मी बन जाती है. फर्क इतना होता है कि फिल्म में कौन हीरो है और कौन हीरोइन, ये सबको मालूम होता है. तीन घंटे की पटकथा का सुखान्त हो ही जाता है. पर जिंदगी की पटकथा में कौन क्या है, ये तो खुद जिंदगी भी नहीं जानती. हाँ, एक बात ज़रूर है कि इंसान अपनी चाल से चलता रहता है. इसी उम्मीद के साथ कि शायद आगे कुछ अच्छा ही होगा. पर जिसने अपनी चाल पर चलते-चलते किसी के साथ अच्छा न किया हो तो क्या उसे अच्छे की उम्मीद करनी चाहिए? सच तो ये भी है कि जो अच्छा करता है वो भी अच्छे की उम्मीद न ही करे तो बेहतर है. कई बार सारी चीज़ें, सारी बातें अपनी जगह पर एकदम सटीक होती हैं लेकिन सबके लिए सटीक हों ये ज़रूरी नहीं है. किसी को ये लगता है कि नवम्बर में होने वाली बारिश महंगाई और सूखे से राहत देगी तो किसी को लगता है कि मौसम की चाल डगमगा गयी है. किसी को फिक्र है तो कोई खौफज़दा है. किसी को लगता है कि प्यार के लिए दो पल ही काफी हैं, बाकी वक़्त दूसरे काम भी ज़रूरी हैं तो किसी को लगता है कि प्यार के लिए 24 घंटे भी कम हैं. किसी को लगता ही कि खुद के प्रति लापरवाह रवैया आपकी पहिचान मिटा देगा तो किसी को लगता है कि दूसरों का उसके प्रति लापरवाह रवैया उसकी पहिचान मिटा देगा. कोई स्वार्थी है, कोई कम स्वार्थी और कोई ज्यादा स्वार्थी हैं. कोई खुद के लिए है, कोई अपने परिवार के लिए. पर सब स्वार्थी हैं. सब को कुछ न कुछ चाहिए. कुछ को सब कुछ मिल जाता है तो किसी को कुछ भी नहीं. ऐसा भी कई बार होता है कि आपके हाथ की चीज़ किसी और के हाथ में चली जाये या कोई और उसे छीन ले. थोड़े देर पहले आप मुस्कुरा रहे होते हैं तो थोड़ी देर बाद ग़मगीन हो जाते हैं. मिजाज़ किसी का भी हो, बदलने में वक़्त नहीं लगता. मौसम तो हमें सिखाता है कि बदलती हुई चीज़ों का सामना हम कैसे कर सकते हैं, हाँ! ये अलग बात है कि कई बार हम बारिश में ज्यादा भीग जाते हैं तो कभी कम. लेकिन भीगते ज़रूर हैं. मैं भी तो बदले हुए मिज़ाज़ की बदौलत ही तो  यहाँ बैठा हुआ हूँ. मेरे पास दो ही विकल्प हैं, या तो बारिश में बाहर निकल जाऊं या फिर बारिश के बंद होने का इंतज़ार करूँ. ये भी मिज़ाज़ की बात है.

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

इस्तीफा

Dear Sir,
पिछले कई महीनों में मैंने आपको अपनी व्यवसायिक समस्याएं व्यक्तिगत तौर पर बताने के बाद ही ई-मेल का सहारा लिया था. पर अब तक किसी तरह का ठोस समाधान मुझे नहीं दिया गया है. मौखिक तौर पर जो भी बातें अब तक सामने आयीं, जैसे कि - ऊपर वाले कुछ कर रहे हैं, ऊपर बात हुई है उन्होंने कहा है कि कुछ करते हैं. इत्यादि.  पर अब तक क्या हुआ है, कुछ भी जानकारी नहीं दी गयी है.  कुछ चीज़ें जो मैंने आपसे मांगी हैं, वो increment, appraisal, promotion और bonus हैं. कोई भी मेहनती, ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी अपनी कंपनी से शायद इन्ही चीज़ों की मांग करता है. मैं ये पूछते-पूछते हताश हो चुका हूँ कि क्या कंपनी मेरे  लिए कुछ कर रही है, हाँ या न? कोई जवाब नहीं मिला है. और जवाब न मिलने से मनोबल लगातार गिर रहा है और मानसिक परेशानी भी बढ़ रही है. मानसिक तनाव के चलते मेरा व्यक्तिगत जीवन भी प्रभावित हो रहा है. इस परेशानी को बर्दाश्त करने की मुझमें हिम्मत बहुत है लेकिन अब मैं इसे और बर्दाश्त नहीं करना चाहता. अब मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैं शुरू से लेकर अभी तक अपने कार्यों के अतिरिक्त जो कार्य (Company name) के लिए कर चुका हूँ, शायद व्यर्थ थे. चाहे वो कंपनी के लिए working hours से ज्यादा 12-14 hours काम करना हो या फिर अवकाश के दिन भी अपनी सेवाएं देने में पीछे न हटना.  कंपनी का मेरे प्रति लापरवाह रवैया होने से मेरे अन्दर का धैर्य जवाब दे चुका है और इसी धैर्य के समाप्त होने की वजह से मैं (Company name) को अपनी कर्त्व्यनिष्ठाता और कार्यों का मालिक होने के अधिकार से वंचित करता हूँ. इस वचन को संपूर्ण मानते हुए मेरे पद से मेरे इस्तीफे को मंज़ूर किया जाये. चूँकि कंपनी मेरे प्रति लापरवाह है किन्तु मुझमें थोड़ा विवेक बाकी है, अतः कंपनी को अगले सात दिनों तक मैं अपनी आपातकालीन सेवा दूंगा जिसमें कंपनी के मुझसे जुड़े हुए कार्यों का नुकसान न हो. ज्ञात हो मेरे इस कठोर कदम के लिए (Company name) का मेरे प्रति लापरवाह रवैया उत्तरदायी है जिसका ज़िक्र मैं अभी तथा पूर्व की सूचनाओं में कर चुका हूँ. मुझे उम्मीद है कि कंपनी मेरा अनुभव प्रमाण पत्र, चारित्रिक प्रमाण पत्र, वेतनमान और देयक देने में लापरवाही नहीं बरतेगी.
Regards
एक कर्तव्यनिष्ठ और मेहनती कर्मचारी.